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विश्व शांति के लिए ३ मिनट

20 अगस्त 2026

विश्व शांति के लिए ३ मिनट

अभी विश्व में बढ़ते जा रहे द्वंद्व और हिंसा ने संपूर्ण मानव समुदाय को चिंतित और दुखी कर दिया है। पूर्वी यूरोप में जारी रूस–यूक्रेन युद्ध, मध्यपूर्व के इजरायल–गाजा युद्ध, अमेरिका–ईरान युद्ध तथा विभिन्न देशों के बीच बढ़ रही राजनीतिक कटुता के कारण विश्व एक गंभीर संकट का सामना कर रहा है।

प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग अपनी जान गंवा रहे हैं जबकि लाखों लोग घायल, बेघर और अंगभंग होकर कष्टमय जीवन बिताने के लिए विवश हैं। असंख्य बच्चे युद्ध की चपेट में आए हैं। युद्ध ने सामाजिक सद्भाव को कमजोर करने के साथ-साथ पर्यावरण को क्षति पहुंचाई है और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डाला है।

ग्लोबल पीस इंडेक्स के अनुसार, वर्ष २०२५ में विश्व के विभिन्न संघर्षों में १ लाख ८१ हजार से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई है। विश्व में प्रतिदिन औसतन लगभग ८ अरब अमेरिकी डॉलर (१२ खरब नेपाली रुपये) सैन्य क्षेत्र में खर्च हो रहे हैं। अभी की परिस्थिति को देखने से बड़े शक्तियों के बीच बढ़ता तनाव व्यापक युद्ध का खतरा बढ़ाता हुआ प्रतीत होता है।

कई संघर्षों में राजनीतिक तथा कूटनीतिक पहलें अभी भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई हैं। ऐसे समय में जब राजनीतिक प्रयास और कूटनीतिक संवाद प्रभावहीन होते जाते हैं, तब हमें फिर से अपनी अंतराचेतना और अस्तित्व की ओर लौटकर समाधान का रास्ता खोजना पड़ता है। ऐसी विनाशकारी और चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में एक साधारण नागरिक या चेतनशील व्यक्ति द्वारा गहरे प्रेम, करुणा और शुद्ध भावना के साथ की गई प्रार्थना, ध्यान तथा सकारात्मक विचार में रूपांतरणकारी शक्ति निहित होती है।

अभी विश्व में हो रहे युद्ध तथा द्वंद्व का कारण कहीं न कहीं मनुष्य के मन में दबे-छिपे कुंठा, क्रोध, घृणा और वैमनस्यता सहित अन्य नकारात्मक विचार और भावनाएं ही हैं। जब लोगों के मन में ऐसे नकारात्मक विचार और भावनाएं निरंतर संचित होती जाती हैं, तो समय के क्रम में वे सामूहिक असंतोष और तनाव के रूप में विस्फोटित होती हैं और हर १०–१५ वर्ष में विनाशकारी रूप लेती हैं। लेकिन सचेत प्रयास, साधना, ध्यान और प्रार्थना से ऐसे विचारों को सकारात्मक दृष्टिकोण और भावनात्मक संतुलन की ओर रूपांतरित किया जा सकता है।

अतः, इस सचेत प्रयास को मूर्त रूप देने के लिए हमने ओशो तपोवन से 'विश्व शांति के लिए ३ मिनट' (3 Minutes for World Peace) अभियान शुरू किया है। प्रत्येक दिन सुबह और शाम ध्यान के बाद तीन–तीन मिनट सामूहिक प्रार्थना करना इसकी एक विनम्र शुरुआत है।

विश्व शांति के लिए प्रार्थना का निमंत्रण

यह अभियान नेपाल तक ही सीमित न रहकर विश्वभर के चेतनशील व्यक्तियों तक पहुंचे, यह हमारा उद्देश्य है। तपोवन में प्रतिदिन लगभग दो सौ लोग और ओशो तपोवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हजारों साधक सामूहिक रूप से दिन में दो बार तीन मिनट युद्ध और हिंसा के अंत तथा विश्व शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।

हमारी इच्छा इसे ओशो के शिष्यों तक ही सीमित न रखकर सभी चेतनशील और शांतिप्रेमी लोग अपनाएं, ऐसी है। इसका मूल उद्देश्य कुछ समय के लिए अभियान चलाना मात्र नहीं है, बल्कि इसे दीर्घकालिक रूप में जीवन का एक हिस्सा के रूप में निरंतरता देना है। ऐसी प्रार्थना बाहरी रूप से ही नहीं बल्कि प्रार्थना करने वाले व्यक्ति के जीवन में भी तत्काल परिवर्तन लाती है। जब एक चेतनशील व्यक्ति गहरे प्रेम और करुणा के साथ प्रार्थना करता है, तो उसका मन शांत होता है और करुणा भाव विकसित होता जाता है। केवल इतना ही नहीं, जब हम निस्वार्थ मन से जगत कल्याण के लिए प्रार्थना करते हैं, तो हम पर अस्तित्व की कृपा और आशीर्वाद रहता है।

आज युद्ध और हिंसा के कारण क्रूरतापूर्ण रूप से जो बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं, घायल और अंगभंग हुए हैं, वे केवल आंकड़े मात्र नहीं हैं; मानवीय संवेदनाओं पर गहरे प्रहार हैं। ऐसी स्थिति में राजनीतिक नेतृत्व के गैरजिम्मेदाराना कदम ने मानवीय चेतना को और पीछे धकेल दिया है। अभी का युग विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सूचना का युग है।

सूचना प्रौद्योगिकी ने विश्व को एक परिवार की भांति करीब ला दिया है। आज का विज्ञान और प्रौद्योगिकी अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज में निरंतर आगे बढ़ रही है; लेकिन विडंबना यह है कि इसी पृथ्वी पर लोग युद्ध, हिंसा और अशांति के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। यही युग मानसिक विचलन, आत्मविस्मृति और निरंतर उत्तेजना का युग भी बन गया है। राजनीति और धर्म के दुरुपयोग ने इसे और जटिल बना दिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वर्ष २०२१ में विश्वभर में लगभग १.१ अरब लोग--यानी प्रत्येक सात में से लगभग एक व्यक्ति--मानसिक विकार से प्रभावित थे जबकि WHO की वर्ष २०२५ की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार विश्वभर में १ अरब से अधिक लोग मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से प्रभावित हैं। इसलिए मनुष्य की चेतना में शांति का बीज बोना आवश्यक है। हृदय में शांति और विवेक न होने पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास भी विनाश का साधन बन जाता है। ध्यान और प्रार्थना चेतनशील व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले सरल और सचेत प्रयास हैं।

विचार की शक्ति के बारे में हमारे संतों ने बहुत कुछ कहा है और विभिन्न ध्यान विधियों का प्रतिपादन किया है। अपनी साधना से विचार का सूक्ष्म बोध करने वाले स्वामी खप्तड बाबा ने विचार शक्ति के रहस्य को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'विचार विज्ञान' में इस प्रकार व्यक्त किया है--'विचार प्रकाश की गति (प्रति सेकंड ३ लाख किलोमीटर) से भी कई गुना तीव्र गति से यात्रा करते हैं।' मनुष्य के मन में प्रति घंटे २ से ३ हजार तक विचार निरंतर आते रहते हैं। विचारों के अपने रंग, गंध और प्रभाव होते हैं। यह अति सूक्ष्म होने के कारण हमारी आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके प्रभाव से कोई भी बच नहीं सकता। जब हम एकाग्र होकर एक ही विचार या भाव पर केंद्रित होते हैं, तो हमारा ध्यान और संकल्प गहरा होता है।

अभी शारीरिक तथा मानसिक उपचार के लिए अत्यंत प्रचलित 'रेकी' विधि भी विश्व के किसी भी कोने से हम अपने विचारों तथा भावनाओं के माध्यम से कैसे रोग ठीक कर सकते हैं, इस बात का ज्वलंत उदाहरण है। रूसी महिला नीना कुलागिना भी विचार की शक्ति से चम्मच मोड़ने तथा छोटी वस्तुओं को छुए बिना स्थानांतरित कर दिया करती थीं। ऐसे कई उदाहरण विश्व में मौजूद हैं। इसलिए हमारे विचार हमारी सोच से अधिक प्रभावशाली होते हैं, विशेष तौर पर जब वे मन में बार-बार दोहराए जाते हैं। हमारे विचार हमारे शब्दों जितने ही प्रभावी होते हैं।

कइयों को विश्व के विभिन्न भागों में हो रहे द्वंद्व और हिंसा से हमारा देश प्रत्यक्ष रूप से संबंधित नहीं है ऐसा लग सकता है। लेकिन, मानवता किसी धर्म, सीमा या राष्ट्र तक सीमित नहीं होती है। हमारे द्वारा की गई छोटी सी प्रार्थना से तत्काल युद्ध रुक जाएगा ऐसा कहने का आशय नहीं है, लेकिन इससे कुछ हद तक ही सही, विश्व के किसी भी देश में राजनीतिक और आपराधिक हिंसा के न्यूनीकरण में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार सामूहिक घृणा और भय हिंसा का वातावरण तैयार करते हैं, उसी प्रकार करुणा, प्रेम और शांति का सामूहिक संकल्प मनुष्य के सोच, व्यवहार और सामाजिक संबंधों को शांति की ओर उन्मुख करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

दिसंबर २०२३ से जनवरी २०२४ तक भारत के हैदराबाद में १० हजार से अधिक लोगों की सहभागिता में आयोजित विश्व शांति ध्यान संबंधी अध्ययन में फिलिस्तीन, म्यांमार और सीरिया में राजनीतिक हिंसा की समग्र प्रवृत्ति में उल्लेखनीय कमी आने का उल्लेख किया गया है। अध्ययन ने दिसंबर २०२३ से जनवरी २०२५ तक हिंसक घटनाओं में समग्र रूप से २९.२ प्रतिशत की कमी दर्शाई थी।

इसी प्रकार, वर्ष १९९३ में वाशिंगटन डी.सी. में लगभग चार हजार लोगों की सहभागिता में लगभग दो महीने तक किए गए सामूहिक 'ट्रांससेंडेंटल मेडिटेशन' (टी.एम.) संबंधी अध्ययन ने हत्या, बलात्कार और आक्रमण जैसे हिंसक अपराधों में अधिकतम २३.३ प्रतिशत तक की कमी आने की रिपोर्ट दी थी।

अगस्त–सितंबर १९८३ में जेरूसलम में टी.एम. समूह संबंधी एक अध्ययन ने समूह में भाग लेने वालों की संख्या अधिक होने वाले दिनों में लेबनान युद्ध में होने वाली मौतों के कम होने का संबंध दर्शाया था। अध्ययन के एक विश्लेषण में उच्च सहभागिता की अवधि में युद्ध संबंधी मौतें लगभग ७६ प्रतिशत तक घटने की रिपोर्ट की गई थी। यह शोध १९८८ में येल यूनिवर्सिटी के 'जर्नल ऑफ कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन' में प्रकाशित हुआ था।

नेपाल एक आध्यात्मिक देश है। हमारे पास खुला हृदय, ध्यान–प्रार्थना की परंपरा और समृद्ध आध्यात्मिक संस्कृति है। शांति, करुणा और सह-अस्तित्व की यही चेतना आज विश्व को भी आवश्यक है।

अतः, चौबीस घंटों में सुबह–शाम तीन–तीन मिनट का समय युद्ध की समाप्ति के लिए निकालना खास कठिन नहीं है। हमारे ऋषि-मुनियों ने भी कठिन परिस्थितियों में जगत कल्याण के लिए प्रार्थना करने की परंपरा बसाई थी। आधुनिक शोध ने दिखाया है कि ध्यान मानव मस्तिष्क, तनाव और भावनात्मक संतुलन पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। अब इसे एक दिन या एक अध्ययन तक ही सीमित न रखें। यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को प्रतिदिन इस अभियान से जोड़ते जाने पर यह युद्ध और हिंसा से आक्रांत विश्व में शांति, करुणा और सद्भाव का वातावरण निर्मित करने में योगदान दे सकता है।

द्वंद्व और हिंसा का बीज पहले मनुष्य के मन में बोया जाता है; इसलिए युद्ध और हिंसा का वास्तविक निवारण भी मनुष्य की चेतना के परिवर्तन से ही शुरू होना चाहिए। परमाणु बम तथा आधुनिक विनाशकारी हथियार आज के मानवता के लिए अभिशाप हैं। क्योंकि छोटी सी तकनीकी त्रुटि हो या गलत राजनीतिक नेतृत्व द्वारा आवेश में किया जाने वाला व्यवहार या मानसिक विक्षिप्तता में की जाने वाली छोटी सी भूल हो, इस विश्व को मरुभूमि में परिणत होने में अधिक देर नहीं लगती।

प्रतिदिन सुबह और शाम तीन मिनट प्रार्थना करना व्यक्तिगत रूप से एक छोटे से प्रयास जैसा प्रतीत हो सकता है। लेकिन जब बहुत से लोग एक ही सकारात्मक भाव, प्रेम और करुणा के साथ प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं, तो उससे सामूहिक रूप से शांति और सद्भाव की चेतना का विकास हो सकता है। ऐसा सकारात्मक संकल्प मनुष्य के विचार और व्यवहार के माध्यम से समाज में व्याप्त अशांति और नकारात्मकता को कम करने में योगदान देता है।

अस्तित्व ने हमें प्रकृति से परिपूर्ण सुंदर पृथ्वी प्रदान की है, लेकिन आज यही पृथ्वी हिंसा, द्वंद और विनाश के कारण अधोगति की ओर उन्मुख हो रही है। विश्व में सैन्य क्षेत्र में खर्च हो रहा प्रतिदिन लगभग ८ अरब अमेरिकी डॉलर (१२ खरब नेपाली रुपये)--जिसका दो दिनों का खर्च जोड़ लिया जाए तो नेपाल जैसे देश का वार्षिक बजट बन जाता है--इसका एक बड़ा हिस्सा अविकसित और युद्ध प्रभावित देशों की शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी निवारण में निवेश किया जा सके, तो विश्व का स्वरूप कितना सुंदर हो सकता है?

अंत में, हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा युगों से जगत कल्याण के लिए की जाती रही प्रार्थना का स्मरण करें। मैं सभी से युद्ध और हिंसा के अंत के लिए इस अभियान से जुड़ने का आग्रह करता हूँ। यह केवल एक छोटी सी प्रार्थना नहीं है, बल्कि शांति और करुणा की नई संस्कृति की शुरुआत है। यह इस संदेश को देता है कि हम विश्व के प्रति संवेदनशील हैं और इसकी परवाह करते हैं--'We care for the world'--।

सर्वे भवन्तु सुखिनः।

सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।

मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥

“सभी सुखी हों, सभी निरोगी हों, सभी शुभ और मंगलमय चीजें देखने पाएं, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।”